विविधता में एकता: भारत की वो 5 बातें जो आपको हैरान कर देंगी
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भारत को समझना मानो एक जीवित संग्रहालय में प्रवेश करना है—जहाँ हर मोड़ पर नया रंग, नई ध्वनि और नई कहानी आपका स्वागत करती है। रेल से की गई यात्रा इस अनुभव को और भी गहरा कर देती है। बदलते भू-दृश्यों के साथ स्टेशन-दर-स्टेशन बदलती भाषाएँ, लिपियाँ और बोलियाँ यह अहसास कराती हैं कि यह देश केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि संस्कृतियों का विराट संगम है। एक सदी पहले इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने भारत की इसी “अचंभित कर देने वाली विविधता” को देखकर प्रश्न उठाया था कि इसका इतिहास लिखना कितना कठिन है। उनका निष्कर्ष था—इस विविधता के भीतर एक अदृश्य सूत्र है, जिसे हम “विविधता में एकता” कहते हैं।
1. आँकड़ों में झलकती बहुरंगी भारत-छवि
भारत की विविधता केवल भावनात्मक विचार नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक अध्ययनों से प्रमाणित वास्तविकता है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण द्वारा संचालित People of India project ने देश की सामाजिक संरचना का व्यापक चित्र प्रस्तुत किया।
- भारत 1.4 अरब से अधिक लोगों का घर है—विश्व की जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ हिस्सा।
- यहाँ 325 से अधिक भाषाएँ और लगभग 25 लिपियाँ प्रचलित हैं।
- देश में 4,635 से अधिक समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के साथ निवास करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने मूल स्थान से दूर रहकर भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं। प्रवास और परंपरा का यह संतुलन ही भारत की एकात्म शक्ति का आधार है। विविधता में एकता
2. एक ही अनाज, अनगिनत स्वाद
भारतीय रसोई इस बात का प्रमाण है कि समान आधार से भी अनंत रूप गढ़े जा सकते हैं। चावल, गेहूँ, जौ, बाजरा, ज्वार और रागी—ये ‘मुख्य अनाज’ पूरे देश की थाली को जोड़ते हैं।
चावल के ही अनेक रूप—सोना मसूरी, बासमती, पोननी, कोलम—क्षेत्र बदलते ही स्वाद और सुगंध में भिन्न हो जाते हैं। दालों में अरहर, मूंग, मसूर, लोबिया और राजमा अपनी-अपनी पहचान रखते हैं।
फिर भी, हल्दी, जीरा, इलायची और अदरक जैसे मसाले उत्तर से दक्षिण तक समान रूप से उपयोग में आते हैं। यही साझा स्वाद भारतीय भोजन को एक सूत्र में बाँधता है—एक सामग्री, हजारों व्यंजन। विविधता में एकता
3. साड़ी: परंपरा और प्रयोग का संगम
साड़ी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारतीय रचनात्मकता का जीवंत प्रतीक है। बिना सिले कपड़े का यह परिधान सदियों से भारतीय स्त्री की पहचान बना हुआ है।
17वीं शताब्दी में भारतीय सूती कपड़ों पर छपी ‘छींट’ (Chintz) यूरोप में इतनी लोकप्रिय हुई कि इंग्लैंड और फ्रांस को अपने स्थानीय उद्योग बचाने के लिए इसके आयात पर रोक लगानी पड़ी।
दक्षिण भारत के ग्रामीण जीवन में साड़ी बहुउद्देशीय है—यह झूला बनती है, पानी छानती है, अनाज ढोती है और वर्षा से बचाव भी करती है।
बनारसी, कांजीवरम, पैठनी, पाटन पटोला, मूगा और मैसूर जैसी विविध रेशमी साड़ियाँ क्षेत्रीय विशेषताओं से भिन्न होकर भी एक ही मूल अवधारणा का विस्तार हैं।
महर्षि श्री अरबिंदो ने कहा था—“एक में अनेक का भाव ही भारत की सुदृढ़ नींव है।”
4. मकर संक्रांति: एक पर्व, अनेक नाम
फसल कटाई का उत्सव, जो 14 जनवरी के आसपास मनाया जाता है, पूरे भारत को एक भाव में बाँध देता है।
- पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी
- गुजरात में उत्तरायण
- असम में माघ बिहू
- तमिलनाडु में पोंगल
- आंध्र प्रदेश में पेड्डा पांडुगा
- केरल में मकर विलक्कू
नाम बदलते हैं, पर सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के स्वागत की भावना एक ही रहती है। विविधता में एकता
5. महाकाव्य: सांस्कृतिक एकता का आधार
रामायण और महाभारत केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना के स्तंभ हैं।
पंचतंत्र की कथाओं के सैकड़ों रूपांतरण विश्व की अनेक भाषाओं में मिलते हैं। तमिलनाडु में ही महाभारत के सौ से अधिक लोक रूप प्रचलित हैं। भील, गोंड और मुंडा जैसे जनजातीय समुदायों ने इन कथाओं को अपने इतिहास से जोड़ा है। विविधता में एकता
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने अनुभवों में लिखा कि ग्रामीण भारत में इन महाकाव्यों का प्रभाव इतना गहरा है कि निरक्षर लोग भी इनके श्लोकों और प्रसंगों से परिचित हैं—यही सांस्कृतिक धागा उन्हें जोड़ता है।
कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने भी प्रार्थना की थी कि भारत “अनेकता में एकता” की इस अनुभूति को कभी न खोए। विविधता में एकता
निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि अपनी पूँजी मानती है। यहाँ भिन्नताएँ टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं।
आज प्रश्न यह नहीं कि भारत विविध क्यों है—प्रश्न यह है कि क्या हम अपने दैनिक जीवन में उस अंतर्निहित एकता को पहचान पा रहे हैं, जो इस विराट विविधता को एक राष्ट्र की अनुभूति में बदल देती है? विविधता में एकता
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